जो कोई सुनिश्चित को छोड़ कर अनिश्चित का भरोसा करता है उसको अनिश्चित तो मिल नहीं पाता ,सुनिश्चित भी हाथ से निकल जाता है

मध्यप्रदेश में सत्ता परिवर्तन के कई दिनों बाद अचानक फिर जंगली बाबा सपने में आए,आते ही डांटने लगे,अंटसंट बकते हुए बोलें, नालायक इतनी देर तक सोता है ! मैंने स्वप्नें में ही हाथ जोड़ कर निवेदन किया,. बाबा 3 फिट दूर से कोरोना गाइड लाइन का पालन करें,हमारे पीएम एवं सीएम का निर्देश है, वे तम-तमाते हुए बोले, ठीक है ठीक है,तू मेरी बात ध्यान से सुन, मेरे पास ज्यादा समय नहीं है अभी कई जगह जाना है तेरे जैसे मूर्खों को जगाने ! मैंने भी मन को ध्यान मुद्रा में करने का नाटक करते हुए बोला हां बाबा बोलों, बाबा ने एक गंभीर सांस खींची और कहा सुन ” एक कद्दावर सांड था। उसका नाम अभी याद नहीं आ रहा बाद में बता दूंगा। वह मद से चूर हो कर अपने झुंड को छोड़ कर अलग चला गया और जंगली जीवन बिताने लगा। उसको न तो रोकने वाला कोई चरवाहा था,न टकराने वाला कोई दूसरा सांड। वह मस्ती में आकर अपनी सींगों से नदी के कांगरों को ढहाता रहता और इधर-उधर घूमता हुआ हरी-भरी दूब चरता रहता। उसी जंगल में एक सियार रहता था। चल सियार का नाम भी बाद में बता देंगे, तो हां सुन एक बार ये सियार अपनी जोरू के साथ नदी के किनारे आराम से बैठा हुआ था। 

 
कुछ समय बाद वही सांड पानी पीने के लिए नदी के उसी किनारे पर आता है। उसके लटके हुए अण्डकोषों को देख कर सियारिन ने सियार से कहा “स्वामी,इस सांड के इन लटके हुए मांसपिंडों को तो देखो। पक कर एकदम तैयार हैं। लगता है घंटे आधे घंटे में ये नीचे आ गिरेंगे। आपको चाहिए कि आप इसके पीछे-पीछे लगे रहिए।” सियार बोला,” प्रिये, कुछ मालूम नहीं कि ये नीचे गिरेंगे भी या नहीं। फिर तुम इस बेकार के काम में मुझे क्यों लगा रही हो ? तुम यही रुकी रहो। जब चूहे पानी पीने नदी की ओर आएंगे तो उन्हें दबोच कर मैं तुम्हारे साथ उनका भोजन करूँगा। यह देखों ये रहा उनका आने-जाने का रास्ता। यदि मैं तुम्हे छोड़ कर इस तरह सांड़ के पीछे चला गया तो कोई दूसरा जानवर आकर इस जगह पर कब्ज़ा जमा लेगा। इसलिए मेरी राय तो यही है कि उस सांड के पीछे -पीछे न चला जाये। जो कोई सुनिश्चित को छोड़ कर अनिश्चित का भरोसा करता है उसको अनिश्चित तो मिल नहीं पाता ,सुनिश्चित भी हाथ से निकल जाता है।” 


सियारिन बोली, जो मिल चूका है उसी को ले कर संतोष कर लेते हो तुम नाकारा हो। नर को सदा उद्योगी होना चाहिए। कहते हैं कि जहां कोई काम उत्त्साह के साथ शुरू किया जाता है जहां किसी काम में आलस नहीं किया जाता,जहा निति, पराक्रम का संयोग होता है ,वहां लक्ष्मी का अचल निवास होता है। 

जो अपना आदर-सम्मान होने पर खुशी से फूल नहीं उठता और अनादर होने पर क्रोधित नहीं होता तथा गंगा जी के कुण्ड के समान जिसका मन अशांत नहीं होता, वह ज्ञानी कहलाता है।


मनुष्य को न तो यह मान लेना चाहिए कि भाग्य ही सब-कुछ है और न ही यह मान कर अपने उद्योग को छोड़ना चाहिए। यदि उद्योग न किया जाय तो तिल में तेल रहते हुए भी उसे निकाला नहीं जा सकता। 
जो मंदबुद्धि थोड़े से ही में संतोष कर लेता है उस अभागे को लक्ष्मी मिल भी जाए तो छोड़ कर चली जाती है। 
जो तुम यह कहते हो कि जरूरी नहीं कि गिर ही जाएं,उसके विषय में भी सुन लो, बड़ाई और पूजा उनकी होती है जो दृढ़निश्चयी होते हैं न कि उनकी जो मोटे या आकर से बड़े होते हैं। चातक कितना ही छोटा होता है पर उसके दृढ़निश्चय के आगे इंद्र को स्वयं पनिहारे का काम करना पड़ता है। 


सियारिन कुछ तेजतर्रार थी। सियार पर उसकी चाल चल जाती थी इसलिए उसने उसे घुड़क दिया,”देखो चूहे का मांस खाते -खाते तो मेरा जी ऊब गया है। ये मांसपिंड तो अब गिरने को हैं इसलिए तुम्हें वही करना होगा जो मैंने कहा है, और कुछ नहीं।”


सियार की तो शामत आ गई। वह उस स्थान को छोड़ कर जहा चूहें इफरात मिल सकते थे,सांड के पीछे-पीछे चलने लगा। पुरुष तभी तक अपनी मर्जी का मालिक होता है जब तक स्त्री के वचनरुपी अंकुश से बेकाबू नहीं कर दिया जाता। जहां वह औरत के कहने में आया वहां उसे ये ख्याल नहीं रहता कि क्या करना है,क्या नहीं; कहां जाना है,कहां नहीं; क्या खाना है,क्या नहीं। 


इस तरह सांड के पीछे-पीछे चलते-चलते उसका बहुत समय बीत गया। न तो अण्डकोष को गिरना था, न गिरे। इसके बाद सियार ने ऊब कर सियारिन को झल्लाते हुए कहां,” अब यदि….. इतने समय तक नहीं गिरे तो हमें लौट कर अपनी पुरानी जगह पर जा बैठना चाहिए।”  


“जंगली बाबा ने जो मुझे सुनाया वही वाक्य मैं आप लोगों को सुना रहा हूँ।”  शेष अगली कड़ी में ….. 

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